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सुसंभाव्य

हिंदी साहित्यिक पत्रिका


ISSN:2321 - 3922

RNI - BIHHIN05394

REGD. NO. PT/105/BGP- 2013- 2027

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✦ मानव ने आज तक जितना भी सोचा है वह सब साहित्य में समाया है। ✦ हिंदी साहित्य की आत्मा को महसूस अवश्य कीजिए। ✦ साहित्य में विषयवस्तु निश्चेष्ट हो जाती है, यदि उसमें प्राण न रहे। ✦ अंधेरा है वहाँ जहाँ आदित्य नहीं है, मुर्दा है वह देश जहाँ साहित्य नहीं है। ✦ सुसंभाव्य की दृष्टि-सृष्टि सदा से सृजनशील है। ✦ सुसंभाव्य में चेतना के बीज का उदगार है। ✦ सुसंभाव्य का निरंतर बढ़ती ऊंचाई साहित्यकारों द्वारा सदैव प्रसंशनीय है। ✦ सुसंभाव्य के साथ जुड़ना बड़े गर्व की बात है। ✦ सुसंभाव्य जीवन सन्दर्भों के परिपेक्ष्य में अत्यंत संवेदनशील है। ✦ मानव ने आज तक जितना भी सोचा है वह सब साहित्य में समाया है। ✦ हिंदी साहित्य की आत्मा को महसूस अवश्य कीजिए।span> ✦ साहित्य में विषयवस्तु निश्चेष्ट हो जाती है, यदि उसमें प्राण न रहे। ✦ अंधेरा है वहाँ जहाँ आदित्य नहीं है, मुर्दा है वह देश जहाँ साहित्य नहीं है। ✦ सुसंभाव्य की दृष्टि-सृष्टि सदा से सृजनशील है। ✦ सुसंभाव्य में चेतना के बीज का उदगार है। ✦ सुसंभाव्य का निरंतर बढ़ती ऊंचाई साहित्यकारों द्वारा सदैव प्रसंशनीय है। ✦ सुसंभाव्य के साथ जुड़ना बड़े गर्व की बात है। ✦ सुसंभाव्य जीवन सन्दर्भों के परिपेक्ष्य में अत्यंत संवेदनशील है।

सुसंभाव्य पत्रिका - 2017

इसका ई-संस्करण विश्वग्राम के सभी पाठकों के लिए निःशुल्क शुलभ है। मुद्रित संस्करण यथासंभव रचनाकारों और हिंदी के विकास के लिए समर्पित संस्था एवं संस्थानों को प्रेषित किया जाता है।

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अप्रैल 2017

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